खुदा की मर्ज़ी…

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शिद्दत भी थी ईमान भी था…
हर दुआ में उनका नाम भी था..
ना मिले वो,
इसमें खुदा की कोई मर्ज़ी थी…
गर मिल जाते तो साथ जीना दुश्वार ही था….

भूल…

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जाते जाते कर गए…
वो हमको यूँ मजबूर…
ये दिल मेरा ना रहा…
कर बैठा था ये भूल…
अब किससे करे शिकवा…
क्या गिला करे..
गलती की तो सज़ा पाई…
होना था ही इसे चूर….